अगर मैं हिजड़ा होता तो क्या होता?
एक ऐसा सवाल जो मज़ाक लगता है, लेकिन सच में सिस्टम को नंगा कर देता है
ज़रा रुककर सोचो।
ईमानदारी से, बिना हँसे।
अगर मैं हिजड़ा होता —
तो क्या मैं वही इंसान नहीं रहता जो आज हूँ?
वही दिमाग, वही सपने, वही भूख, वही डर?
फिर अचानक मेरी पहचान ही मेरे खिलाफ क्यों खड़ी हो जाती?
जन्म वही, गलती किसकी?
कोई बच्चा पैदा होते वक़्त ये फ़ॉर्म नहीं भरता कि
“मैं लड़का बनना चाहता हूँ”
“मैं लड़की बनना चाहती हूँ”
“मैं हिजड़ा नहीं बनना चाहता”
फिर भी, जब कोई हिजड़ा पैदा होता है,
तो सबसे पहले दोष उसी के हिस्से आता है।
माँ रोती है
बाप शर्मिंदा होता है
रिश्तेदार फुसफुसाते हैं
और समाज फैसला सुना देता है —
“इसे अलग रखो”
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो शायद मेरा पहला अपराध मेरा जन्म ही होता।
स्कूल: जहाँ भविष्य नहीं, फर्क सिखाया जाता है
सोचो, मैं हिजड़ा बच्चा हूँ और स्कूल जाता हूँ।
किताब वही, क्लास वही, टीचर वही —
लेकिन नज़रें अलग।
कोई बेंच शेयर नहीं करना चाहता
कोई दोस्त नहीं बनाना चाहता
और अगर आवाज़ थोड़ी अलग हो गई…
तो हँसी पूरे क्लास में गूंज जाती
टीचर कहते:
“Ignore करो”
लेकिन सच ये है —
जो ignore होता है, वही अंदर से टूटता है।
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो शायद मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी होती,
पढ़ाई ने मुझे छोड़ दिया होता।
काम करने की इजाज़त, लेकिन इज़्ज़त की नहीं
सब कहते हैं —
“काम करो, मेहनत करो, भीख क्यों मांगते हो?”
अब सच सुनो।
अगर मैं हिजड़ा होता और नौकरी ढूँढने जाता:
Interview से पहले reject
Resume से पहले judge
और talent से पहले gender
कोई ये नहीं पूछता:
“तुम क्या कर सकते हो?”
सब यही देखते हैं:
“तुम कौन हो”
फिर वही समाज बोलता है:
“ये लोग ताली क्यों बजाते हैं? ये भीख क्यों मांगते हैं?”
क्योंकि तुमने दरवाज़े बंद कर दिए,
और अब सवाल पूछ रहे हो कि अंदर क्यों नहीं आए।
मज़ा तब आता है जब वही लोग ज्ञान देते हैं
सबसे ironic बात?
जो लोग हिजड़ों को देख कर रास्ता बदलते हैं,
वही लोग Instagram पर पोस्ट डालते हैं:
“Respect everyone ❤️”
“Humanity first 🌍”
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो मुझे समझ आ जाता कि
सोशल मीडिया की empathy और असली empathy में फर्क क्या होता है।
डर, जो हर दिन साथ चलता है
लोग सोचते हैं हिजड़े डराते हैं।
पर सच ये है —
हिजड़े खुद डरे हुए जीते हैं।
रात को अकेले निकलने से डर
पुलिस से डर
लोगों के मज़ाक से डर
और सबसे ज़्यादा —
अकेले मर जाने का डर
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो शायद मुझे भगवान से नहीं,
इंसानों से ज़्यादा डर लगता।
परिवार: जहाँ अपनापन सबसे पहले टूटता है
दुनिया तो बाद में मारती है,
पर पहला वार परिवार करता है।
“लोग क्या कहेंगे?”
“इज़्ज़त चली जाएगी”
“इसे कहीं भेज दो”
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो शायद मुझे ये समझ आ जाता कि
खून का रिश्ता और दिल का रिश्ता अलग चीज़ है।
फिर भी… वो हँसते क्यों हैं?
अब असली सवाल।
इतनी तकलीफ़, इतना अकेलापन,
फिर भी हिजड़े अक्सर हँसते क्यों दिखते हैं?
क्योंकि
रोने पर कोई नहीं सुनता
गुस्सा करने पर डर लगता है
और हँसी… हँसी एक ढाल बन जाती है
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो मेरी हँसी खुशी नहीं,
survival strategy होती।
असल में “नॉर्मल” कौन है?
अब उल्टा सोचो।
जो इंसान किसी को बिना नुकसान पहुँचाए जी रहा है,
या
जो इंसान सिर्फ “अलग” होने की सज़ा दे रहा है?
अगर मैं हिजड़ा होता,
तो शायद मुझे ये समझ आ जाता कि
नॉर्मल होना कोई achievement नहीं है।
आख़िरी बात (और ये मज़ाक नहीं है)
ये पोस्ट किसी पर तरस खाने के लिए नहीं है।
ये पोस्ट आईना है।
अगली बार जब तुम किसी हिजड़े को देखो:
रास्ता बदलने से पहले सोचो
मज़ाक उड़ाने से पहले सोचो
और ज्ञान देने से पहले…
खुद को देखो
क्योंकि सवाल ये नहीं है कि
“अगर मैं हिजड़ा होता तो क्या करता?”
असली सवाल ये है:
अगर वो इंसान है, तो तुम क्या कर रहे हो?